रुपया-पैसा, जेवर नहीं.. धान देकर निभाई जाती है ‘दान’ की अनोखी परंपरा, घर-घर गूंजता हैं ‘छेरछेरा

डोमार साहू (गिधपुरी) छत्तीसगढ़ में आज हर्षोउल्लास के साथ छेरछेरा तिहार मनाया गया बच्चे सुबह से हाथ में थैला लेकर घर-घर में दस्तक देकर छेरछेरा मांगे चलिए जानते हैं दान के महापर्व की पूरी कहानी…
छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा व संस्कृति से ओतप्रोत छेर छेरा तिहार आज पूरे प्रदेश में उत्साह के साथ मनाया गया। लोक संस्कृति का एक ऐसा पर्व है छेर छेरा तिहार, जो दान और समरसता की अनूठी मिसाल पेश करता है। लोग अक्सर रुपया-पैसा या जेवर देकर दान की परंपरा निभाते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में आज यानी पौष पूर्णिमा के दिन छेर छरा पर्व में धान और अन्न देकर अनोखी परंपरा को निभाया इस लोकपर्व पर गांव-गांव और घर-घर “छेर छेरा माई” की गूंज सुनाई दिया जो लोगों को अपनी समृद्धि समाज के साथ बांटने की प्रेरणा देती है।
तिहार का संबंध खेती-किसानी से
छेरछेरा तिहार का सीधा संबंध खेती-किसानी और नई फसल से जुड़ा हुआ है। धान की कटाई के बाद जब घरों में नई फसल आती है, तब किसान उसका पहला अंश दान स्वरूप निकालते हैं। मान्यता है कि धान का दान करने से अन्न भंडार हमेशा भरा रहता है और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। यही कारण है कि इस पर्व पर किसी से पैसा या आभूषण नहीं मांगे जाते, बल्कि केवल धान, चावल या अन्य अनाज ही स्वीकार किए जाते हैं।
गुनगुनाते हैं छेरछरा का गीत
छेरछेरा के दिन बच्चे, युवा और बुजुर्ग समूह बनाकर गांव के हर घर तक पहुंचते हैं। हाथों में टोकरी या बोरी लेकर जाते दिखे इस दौरान छेरछेरा पर्व का गीत भी गुनगुनाते दिखे “छेरछेरा माई, अन्न दान दे माई”। घर की महिलाएं और बुजुर्ग पूरे सम्मान के साथ धान या चावल दान किया गया। यह दृश्य छत्तीसगढ़ की ग्रामीण संस्कृति की जीवंत तस्वीर पेश करता है, जहां दान को धर्म नहीं, बल्कि कर्तव्य माना जाता है।
भाईचारे और बराबरी का संदेश
इस पर्व का सामाजिक महत्व भी बेहद खास है। छेरछेरा तिहार बराबरी और भाईचारे का संदेश देता है। अमीर-गरीब, ऊंच-नीच का भेद इस दिन मिट जाता है। एकत्र किए गए धान का उपयोग सामूहिक भोज, जरूरतमंदों की मदद या धार्मिक कार्यों में किया जाता है। इससे समाज में सहयोग और आपसी विश्वास मजबूत होता है।






