
लवन- समीपस्त ग्राम कोलिहा में वर्मा परिवार के घर चल रहे श्रीमद भागवत कथा के तीसरे दिवस जड़भरत, अजामिल, भक्त प्रह्लाद की कथा का वर्णन किया गया, गुरुवार को बड़ी संख्या में भक्तो ने कथा का आनंद लिया। इस दौरान कथाव्यास तलाश कृष्ण पांडेय ने कहाकि भरत ऋषभदेव के पुत्र थे ऐसा वर्णन आता हैं। भरत ने अपने पुत्रसुमति को राजगद्दी पर बिठा दिया और स्वयं वन में चले गए। जहांवे एक हिरण की ममता में पड़गए। भरत जी घर छोड़कर आएथे भजन करने, लेकिन यहां मनफंस गया। भरत जी की मृत्यु कासमय आया और केवल हिरणीका बच्चा चिन्तन में आ गया, येसोचते-सोचते प्राण निकल गए।भरत जी महाराज को हिरण केशरीर में जाना पड़ा, लेकिन हिरणकी देह में जाने के बाद भरत जीको बड़ी ग्लानि हुई। एक बारवृक्षों में आपस के घर्षण से जंगलमें आग लग गई, आग लगते हीसारे हिरण जंगल छोड़कर भागगए, लेकिन भरत जी नहीं गए। मृग के छौने में तन्मय हो जाने के कारण इनका ज्ञान अवरुद्ध हो गया था जिससे ये जड़भरत कहलाए।आगे प्रहलाद चरित्र का वर्णन करते हुए कहा भगवान हमेशा अपने भक्त को पाना चाहता है। जितना भक्त भगवान के बिना अधूरा है उतना ही अधूरा भगवान भी भक्त के बिना है। भगवान ज्ञानी को नही अपितु भक्त को दर्शन देते हैं। और सच्चे मन से ही भगवान प्राप्त होता है। भगवान विष्णु की भक्ति में लीन रहते थे। उनके पिता हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु को अपना शत्रु मानते थे। पुत्र को भगवान विष्णु की भक्ति करते देख उन्होंने उसे ही जान से मारने की ठान ली। प्रभु पर सच्ची निष्ठा और आस्था की वजह से हिरण्यकश्यप प्रह्लाद का कुछ भी अनिष्ट नहीं कर पाए।
कथा का आयोजन वर्मा परिवार कोलिहा द्वारा किया गया है।



