
लवन – आज के डिजिटल युग में जहां बच्चे अपना अधिकांश समय मोबाइल स्क्रीन वीडियो गेम्स और सोशल मीडिया पर बिता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर लवन के कई गलियों चौपालों और मैदानों में एक बार फिर पारंपरिक खेलों की रौनक लौटने लगी है। खासकर, बच्चों के बीच सदियों से लोकप्रिय रहे कंचे (गोली) खेलने का क्रेज एक बार फिर परवान चढ़ रहा है। स्कूल की छुट्टी के बाद या शाम के वक्त धूल भरे मैदानों में कंचों की खनक और बच्चों का उत्साह देखते ही बनता है।निशानेबाजी का सटीक हुनर और अचूक एकाग्रताकंचों का खेल सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह बच्चों में मानसिक एकाग्रता, दूरदर्शिता और सटीक निशानेबाजी की कला को भी विकसित करता है। खेल के जानकारों का कहना है कि जब बच्चा जमीन पर बने गड्ढे जिसे स्थानीय भाषा में ‘गोली’ या ‘घर’ कहा जाता है में कंचा डालने के लिए अंगूठे और उंगली का सही संतुलन बनाता है, तो उसका पूरा ध्यान लक्ष्य पर केंद्रित होता है। यह खेल बच्चों के हाथ और आंखों के तालमेल बनाए रखता है लवन के स्थानीय लोगों का कहना है कि आज के बच्चों का बचपन चार दीवारों और मोबाइल तक सीमित हो गया है, ऐसे में कंचे जैसे खेल उन्हें शारीरिक रूप से सक्रिय रखने और सामाजिक मेल-जोल बढ़ाने का बेहतरीन अवसर देते हैं। यह खेल पीढ़ियों को जोड़ने का काम कर रहा है, जहां बड़े भी अपने बचपन की यादों में खो जाते हैं।वही एक बार फिर से गलियों में गूंजती कंचों की आवाज और बच्चों की बेपरवाह हंसी यह यकीन दिलाती है कि हमारी संस्कृति की जड़ें और पारंपरिक खेल आज भी जिंदा हैं जिन्हें संजोए रखने की जरूरत है।



